A letter from Shree Mataji on the auspicious Diwali occasion

On the auspicious occasion of Diwali, a letter from Shree Mataji

Dear Sahaja Yogies, My dear children,

Why are our lamps shaky (topsy turvy)? Think about the reason – are we not protecting our lights well? Have you forgotten the sheer and pure love of your Mother that you have become shaky & confused? Just like the glass protects the flame, similarly my love will protect you all. But you have to keep the glass clean. Now how else should I explain this? Do I have to repeat what Shri Krishna had said – Leave all religions aside and come to me or the way Lord Christ had said – I am the path and I am the entrance gate (inside the Kingdom of God)! I want to let you know that I am the last destination but will you be able to accept this fact? Can this truth be taken to your heart?

Although many a things that I say is often manipulated but remember that truth remain the same – it is fixed! You cannot change the truth. Without the knowledge of truth, you will always remain in the darkness of ignorance…backdated & regressive. I regret this regressive status of yours!

Diwali is the day for truthful & wholesome aspirations. The entire universe needs invocation. You have to light many a lamps and protect them too. Pour the oil of love, Mother Kundalini is the wick. With the divine light of your enlightened spirit, awaken the Kundalini of others. Illuminate the collective Kundalini flame that will appear as the guiding torch! As the flame of the torch glows – so will my pure love form a protection shied around you. My protection will be infinite in nature – with neither beginning nor end. I will be ever watchful of my devotees. My love showers infinite blessings on you all!

Your loving Mother,

Nirmala
(Nirmal Yog, 1983)

Translated from the letter in Hindi given below.

शुभ दीपावली पर श्रीमाताजी का एक पत्र

प्रिय सहजयोगियो, मेरे प्रिय बच्चों……

हमारे दीपक डांवाडोल क्यों हैं? आपको चाहिये कि इस विषय पर सोचें कि क्या उऩके चहुं ओर कोई पारदर्शी कवच नहीं है ? कहीं आप अपनी मां के प्रेम को भूल तो नहीं गये हैं जिसके कारण आप डांवाडोल हैं? जिस प्रकार शीशा दीपक की रक्षा करता है वैसे ही मेरा प्रेम भी आपकी रक्षा करेगा। परंतु शीशे को साफ रखना होगा। किस प्रकार मैं इसकी व्याख्या करूं ? श्री कृष्ण की तरह से क्या मुझे भी कहना पडेगा कि सर्व धर्माणाम परितज्य मामेकम् शरणम् व्रज… अर्थात सभी अऩ्य धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ या जैसा ईसा मसीह ने कहा था …. मैं ही मार्ग हूं, मैं ही प्रवेश द्वार हूँ। मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं ही अंतिम लक्ष्य हूँ परंतु क्या आप लोग इस बात को स्वीकार करेंगे ? क्या ये सत्य आपके हृदय में उतरेगा ?

यद्यपि मेरी कही हुई हर बात को तोड़ मरोड़ दिया जाता है फिर भी सत्य तो सदैव अटल रहता है। आप इसे परिवर्तित नहीं कर सकते। सत्य के ज्ञान के बिना आप सदा अंधकार में रहेंगे। सत्य के ज्ञान बिना आप हमेशा अंधकार में रहेंगे, पिछड़े रहेंगे। इस बात का मुझे खेद है। दीवाली सच्ची आकांक्षाओं का दिन होता है। पूरे ब्रह्मांड का आह्वान करें। बहुत से दीपक जलाने होंगे और उऩकी देखभाल करना होगी। प्रेम का तेल डालें, कुंडलिनी बाती है। अपने आत्म प्रकाश से अन्य लोगों की कुंडलिनी को जागृत करो। कुंडलिनी की लौ जल उठेगी। अपसे एकरूप होकर मशाल बन जायेगी। मशाल जलती रहेगी तो मेरे प्रेम का बेदाग कवच बना रहेगा। इसकी न तो कोई सीमा होगी और न कोई अंत होगा। मैं आपको देखती रहूंगी। मेरा प्रेम आप पर अनंत आशीर्वादों की वर्षा कर रहा है।

हमेशा आपकी प्रेममयी मां
निर्मला
(निर्मला योग 1983)

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